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Monday, 6 February 2012

महर्षी अगस्त्य के गुरुकुल में मर्यादा पुरुषोत्तम जननायक प्रभू राम

महर्षी अगस्त्य के गुरुकुल में मर्यादा पुरुषोत्तम जननायक प्रभू राम


संख्या 1महर्षी अगस्त्य अपने शस्त्रों के आगार से नव निर्मित अस्त्र् राम को बहाल करते हए
.... उस क्षेत्र में एक अनोखा कार्य शिव-शक्ति के आशीर्वाद से जागृत है। मैं ने उस जनता के लिए प्राचीनकाल से चली आ रही तमिल नामक बोलीभाषा को संस्कारित कर उसके व्याकरण का निर्माण सिद्ध किया है। ताडपत्र पर लिखने की कला का अविष्कार कर द्रुत गति से लेखन की कला अवगत कराई है। आनेवाले समय में अनेक अन्य महर्षी अपने अपने गुरुकुलों में इस लेखन विधी से आनेवाली अनेको अनेक पीढीयों के जातकों का जीवन भविष्य जान कर उस कथनों को ताडपत्रोंपर पर रेखांकित करेंगे
मैं मानता हूं राम, आपका जीवित कार्य करुणाभाव से प्रेरित होकर जनकल्याण के लिए स्वार्थी राजसत्ता को नष्ट कराने का है।
तो हमारे जैसे ऋषियों को आप के जीवित कार्य़ को आगे बढाने काम करेंगे। आप के उपरांत हम ऋषिगण आप के आदर्शों को सदियों तक चेतना का स्त्रोत बनाकर पीडित जनसमुदाय को करुणा भाव से उत्पन्न नाड़ी भविष्य कथन तथा इच्छुक व्यक्तियों को उनकी कर्मगती के अनुसार मार्गदर्शन करते रहेंगे।  ....
श्री नरेंद्र कोहलीजी की रचना अभ्युदय से कुछ अंश में नाडीग्रंथों का संदर्भ जोड़कर…
आप लोग कौन हैं?’ एक साधारण वृद्ध ने पुछा। मैंने तुम्हे यहां पहले कभी नहीं देखा?’
मैं अयोध्या के चक्रवर्ती दशरथ का पुत्र हूं – राम। यह मेरा भाई सौमित्र है। राम ने परिचय आगे बढाया। यह मेरी पत्नी वैदेही सीता है तथा यह हमारा मित्र, सहयोगी एवम् शस्त्रागार प्रमुख - मुखर है। हम ऋषि अगस्त्य को मिलने आपके गुरुकुल में आए हैं।
ओहो राम, आओ आओ, आपका स्वागत है हमारे विद्यापीठ में। महर्षी अगस्त्य ने आगे होकर कहा। हे लोपामुद्रा, देखो तो कौन आया है आज अपने यहां यहां!’
अगस्त्य को देखकर राम पर एक बृहद बरगद का सा प्रभाव पड़ा। जिसकी छाया में पुरा आश्रम बना हुआ था। अगस्त्य आश्रम का वातावरण अब तक देखे हुए समस्त आश्रमोंसे भिन्न था। यहां खुलकर शस्त्र प्रशिक्षण चल रहा था। स्वयं ऋषि भी शस्त्र धारण किए हुए थे। राम, सीत तथा उनके साथियों का आश्रम में हार्दिक स्वागत हुआ। अगस्त्य ने उनका सत्कार उस प्रकार किया जैस वे उनके अत्यंत आत्मिय हो और उनसे वर्षों पुराना व्यवहार है।
माता लोपामुद्राने सीता को आपने वक्ष में भींच लिया। सीता गदगद कंठ से सम्बोधन निकला, ऋषि मां। लोपामुद्राने उन्हे बाहों की दूरी पर रख कर मुग्ध दृष्टी से निहारा के कहा, हांसे सीख लिया यह सम्बोधन मेरी बच्ची? सीता बोली, ‘आपके लिए दुसरा संबोधन हो ही कैसे सकता है मां? वैसे यह शब्द मैं ने मुनि धर्मभृत की अगस्त्य कथा में सुना है
मैं ने भी सुना है पुत्री कि किसी युवा मुनिने अगस्त्य कथा ताड़पत्र पर लिखी है। वैसे तो सारा जनपद ही मुझे ऋषि मां कहता है। प्रभा को जानती हो? वह, जो सेना नायक पति की शल्यचिकित्सक पत्नी है । प्रत्येक छोटे-बड़े युद्धों के पश्चात उसका महत्व बढ़ जाता है। वह तो मेरी पुत्री है ही तुम भी मेरी पुत्री हो, सीते

लोपामुद्रा लुब्ध भाव से बोली, पति के अभियान में साथ चल पडने वाली स्त्रियां अब नही रही। विंध्याचल पार कर एक अगस्त्य के साथ भारद्वाजी लोपामुद्रा आयी थी । अब राम के साथ जानकी आयी हैआओ, तुम्हे अपना शल्यचिकित्सालय दिखाऊं और पुत्री प्रभा से मिलाऊं
राम के साथ आए हुए लोग क्रमशः लौट गए थे। लक्ष्मण और राम के साथ मिले एक भील शूरवीर सेनानायक मुखर आश्रम के अन्य विभागों का निरीक्षण में व्यस्त हो गए। राम जब से आए थे, अगस्त्य ऋषि के साथ एक लंबे संवाद में उलझे हुए थे। क्रमशः सीता, लक्ष्मण मुखर जान गए की अगस्त्य और राम का संवाद कोई दार्शनिक अथवा सैद्धांतिक विवाद नहीं था। वह उन दोनों के चिंतन का विषय था।
लोपामुद्रा सीता को लेकर मुख्य कुटिया में आयीं। राम और ऋषि आमने सामने बैठे हुए थे और ऋषि कुछ कह रहे थे। उन्होंने सीता और लोपामुद्रा को बैठने का संकेत किया और अपनी बात जारी रखी... जब सारा मानव-ज्ञान, क्षमता, बुद्धि, प्रयत्न – सब कुछ आकर स्वार्थ पर टिक जाएगा तो स्वार्थ की परिसीमा भी संकीर्ण होने लगेगी। उसमें कोई ऐसी बात नही सुनी जाएगी जो मनुष्य के स्वार्थ से विमुक्त कर मानवता की ओर संमुख करती हो। तुम क्या समझते हो? कि रावण केवल आर्य अथवा वानर बुद्धिजीवियों की हत्याएं करता है? वह किसी भी जाति, देश या काल के इस बुद्धिजीवी की हत्या कर देगा जो स्वार्थ परक व्यवस्था का विरोध करेगा। स्वार्थ की सीमा में संकीर्ण होती यह व्यवस्था मात्र स्व को देखती है। उदारता को शत्रुता ओर जिज्ञासा को विरोध मानती है। स्वयं लंका के सामान्य तथा दुर्बल नागरिक किस प्रकार से पिस रहे होंगे यहां बैठकर यह समझ पाना बहुत कठिन है। एक ओर भौतिक दृष्टिसे संपन्न लोग है ओर दुसरी ओर अत्यंत विपन्न लोग। वैसे सुख भी एक मानसिक स्थिती है। अतः रावण जैसे संपन्न लोग कितने सुखी है - कहना कठिन है। वे लोग अधिक से अधिक भौतिक संपन्नता और सुख की ओर बढे हुए विवेक के सारे बंधन तोड चुके है। सिवाय निज के अन्य कोई चिंता उन्हे नहीं है। इसलिए वे लोग आए दिन बरबरता में निहीत सुख और स्वार्थ की चरम स्थिती में अपने सहजाती मानव का मांस खाने लगते हैं और दुसरी ओर शोषित वर्ग की असहायता की यह सीमा है कि जिसका मांस खाया जाता है – वह कुछ कहने कि स्थिती में नहीं है। सारे संबंध को उन्हों ने स्वार्थ अर्थात धनपर टिका है। इसलिए वे धनी तो है पर अपनी क्रूरता में मानवता को भूल कर राक्षस बन गए है।
...यह तो एक अंधकार है राम, जो सारे आकाश पर छाता जा रहा है। और अपने हिंस्त्र पंजों में धरती को दबोचा जा रहा है। उसके प्रतिकार के लिए तो सूर्य को ही धरती पर उतरना होगा, उससे कम में तो इससे लड़ना कठिन है। राम का गंभीर स्वर गुंजा, सारा दंडकवन जाग उठा है। हमने एक एक ग्राम शस्त्रबद्ध कर दिया है। स्थान स्थान पर अनेक राक्षस मारे जा चुके है। जो मारे नही गए वे भाग गए है। दिन दो दिनों की बात नहीं कह रहा – हम दस वर्ष से यहां भटक कहे है और संगठन का काम कर रहे हैं।...
मैं चालीस वर्षोंसे बैठा हूं राम । ऋषि का स्वर और उग्र हो गया। तुम जिस वर्षों की बात कर रहे हो, मैंने भी कितने राक्षसों का वध किया भगाया। किंतु उससे क्या हुआ? राक्षस समाप्त हो गए या साहस शक्ती समाप्त हो गई?  उलटे वे अधिक फैल गए। उन्होंने उन स्थानों को, जाकर खोज़ निकाला; जहां मनुष्य और भी निर्बल, और भी निर्धन तथा और भी असंघठित है। परिणामतः पहलेसे भी अधिक संख्या और मात्रा मे मानव पीडित है
ऋषि कुछ रुके, तुमने क्या किया राम? जहां जहां लोगोंको संगठित किया वहांसे राक्षस निकल गए। जानतो हो वे कहां निकल गए? – वे सब जनस्थान में रावण के सेनापती वन रक्षक के पास पहुचे हुए है। वहां साम्राज्य सेना एकत्रित हो रही है। लंकासे वह स्थान बहुत दूर भी नहीं है। तत्काल रावण द्वारा सहायता पहुंचाई जा सकती है। साम्राज्य की ओर से समस्त अधिकारों से युक्त व्यवस्था की वह सेना है, स्वयं रावण की बहन शूर्पणखा वहां विद्यमान है। वह सेना आक्रमण करेगी तो क्या होगा? तुम्हारा कौनसा संगठन उसे रोक पाएगा? टोला नही, उस व्यवस्था की सेना है जो दशों दिशांओं में राक्षसों को जन्म देती है। उन्हे पोषित करती है,  उनको संरक्षण प्रदान करती है और आक्रमण कि स्थिती में उस सेना को रोका नहीं गया तो हम वह ग्राम या वनों में बसने । वहां दंडकवन में ही नही, ग्रामों पुरवों, नगरों को भी उस प्रकार उखाडती चलेगी जैसे झंझावात नन्हे पौधों को उखाड़ता है। अथवा हल की फाल गीली धरती को उधेड़ती है
तुम जानते हो राम, यदि विनाश लीला हुई तो उसके लिए उत्तरदायी तुम होंगे - क्योकि इसके कारण तुम हो। तुमनेही उत्तेजना दी है ऋषि का चेहरा देख सीता का मन कांप उठा। कितने उत्तेजित थे गुरू कितने उग्र... किन्तु राम...
राम की आखों की गहराई में जैसे हंसी छा गई,

संख्या 2 दंडकारण्य स्थित अगस्त्याश्रम के मार्गपर
मैं राम हूं ऋषिवर और राम अपने किसीभी दायित्व से नहीं भागता। यदि यह मेरे ही कारण हुआ है तो तनिक भी बुरा नहीं हुआ। यदि मैंने जीवन दर्शनों के विरोध को उसी उग्रतासे उभारकर एक दुसरेके आमने सामने खड़ा कर दिया है तो क्या हुआ?  विनाश लीला तो होगी, किन्तु आप मेरा विश्वास करें कि इस लीला में राक्षस पक्ष अपने अत्याचारों का दे पाएगा। - जिस विनाश की स्थिती से आप आशंकित है, जनसामान्य का वह विनाश नहीं हो पाएगा। उसके मरने के नहीं जीने का दिन आ गया है।
यह राजकुमारों का आखेट नहीं है, राम अगस्त्य का स्वर और भी कटु हो गया, यह अंधकार का जीवन-मरण का संघर्ष है। सुख सुविधाओं में पले राजकुमारों को यह महंग पडेगा। तुम भी समझते हो कि छोटे मोटे राक्षसों की हत्याओं से रावण को एक खरोंच तक नहीं लगती। मैं ने कालकेयों को का नाश किया, तो वह उनका सहायता को नहीं आया! क्योंकि उनसे वह रुष्ट, किंन्तु जनस्थल में स्वयं उसकी बहन है, उसके अपने सेनापति है, तो संबंध की दृष्टी  से उसके भाई भी है। उनका विरोध होते ही साम्राज्य क्रूर होउ उठेगा।  वह अपनी समस्त शक्ती से टूट पड़ेगा। उसकी शक्ती को जानतो हो उसके पास भयंकर कवचधारी रथ है – तुम्हारे पास एक घोडातक नहीं है। उसके सहस्त्रों भयंकर शस्त्रधारी राक्षस तुम्हारे छोटेमोटे आयुधोंवाले नौसिखिए सैनिकों को घड़ी–भर में समाप्त कर देंगे। तुम उसकी शक्ति की कल्पना नही कर सकते। स्वयं ब्रह्मा तथा शिव जैसी महाशक्तियां उसकी संरक्षक है। तुम क्या हो – निर्वासित राजकुमार? ऐसा युद्ध होगा कि तुम्हार भाई और पत्नी भी तुम्हें छोड़ भागेंगे ....
नहीं, अनायास सीता के कंठ से चीत्कार फूटा, यह झूठ है
राम सहज रूप से मुस्कुराए, आप स्वयं देखे ऋषिवर, मेरी पत्नीने स्वयं अपना परिचय दिया है, और यह बहुत अच्छा है कि लक्ष्मण और मुखर यहां नहीं है। नहीं तो मुझे भय है कि अपनी उग्रता में वे आपका अपमान कर बैठते। और जहां तक मेरी बात है... सहसा राम का मुखमंडल आरक्त हो उठा, मैं राम हूं । जब राम न्याय के पक्ष में बैठता है तो शिव, ब्रह्मा, विष्णु  जैसे नामों को नही डरता। शक्ती इन नामों में नहीं जन सामान्य में है। मेरा बल जनसामान्य का विश्वास है। कोई शस्त्र, कोई आयुध, कोई सेना, कोई साम्राज्य जनता से बढकर शक्तिशाली नहीं है। आप मेरा विश्वास करें – राम मिट्टी में से सेनाएं गढता है, क्योंकि वह जनसामान्य का पक्ष लेता है। और न्याय का युद्ध करता है
अब बस करें ऋषिवर, राम के चुप होते ही लोपामुद्रा अत्यंत मृदु स्वरमें बोली, बहुत परीक्षा हो चुकी। अब बच्चों को अधिक न तपाएं। इन्हें आशीर्वाद दे दें – ये समर्थ है
ऋषि के चेहरेपर आनंद प्रकट हुआ, तो राम पंचवटी जाने के लिए मैं तुम्हें नियुक्त करता हूं। और इस सारे भूखंड़ की जनशक्ती तुम्हारे हाथ में देता हूं ... न्याय का पक्ष कभी न छोडना और जनविश्वास को अपनी एकमात्र शक्ति मानना।... जाओ मेंरे अनेक आश्रम आपको मदद करेंगे। विंध्यपर्बत के दक्षिण मे एक आश्रम पंचवटी के निकट है। अनेक नील पर्बत के पास है। शिव पंचमहाभूतों के आधार से स्थित विविध नगरों के समीप है । एक अरुणाचल में, एक कालहस्ति, एक चिदंबर, एक कावेरी नदी के तीर पर त्रिलोचन, तथा एक कांची स्थित है।  
उस क्षेत्र में एक अनोखा कार्य शिव-शक्ति के आशीर्वाद से जागृत है। मैं ने उस जनता के लिए प्राचीनकाल से चली आ रही तमिल नामक बोलीभाषा को संस्कारित कर उसके व्याकरण का निर्माण सिद्ध किया है। ताडपत्र पर लिखने की कला का अविष्कार कर द्रुत गति से लेखन की कला अवगत कराई है। आनेवाले समय में अनेक अन्य महर्षी अपने अपने गुरुकुलों में इस लेखन विधी से आनेवाली अनेको अनेक पीढीयों के जातकों का जीवन भविष्य जान कर उस कथनों को ताडपत्रोंपर पर रेखांकित करेंगे
मैं मानता हूं राम, आपका जीवित कार्य करुणाभाव से प्रेरित होकर जनकल्याण के लिए स्वार्थी राजसत्ता को नष्ट कराने का है।
तो हमारे जैसे ऋषियों को आप के जीवित कार्य़ को आगे बढाने काम करेंगे। आप के उपरांत हम ऋषिगण आप के आदर्शों को सदियों तक चेतना का स्त्रोत बनाकर पीडित जनसमुदाय को करुणा भाव से उत्पन्न भविष्य कथन तथा इच्छुक व्यक्तियों को उनकी कर्मगती के अनुसार मार्गदर्शन करते रहेंगे। 

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महर्षी अगस्त्य आश्रम में पहुचने से पहले की राम कथा।